इस कदर उलझ गयी हैं राहें,
की कहाँ से सुलझाना शुरू करुँ, मालूम नहीं।
किस ऒर जा रही है जिंदगी, मालूम नहीं।
मेरे दिल में आखिर क्या है,समझ नहीं,
किसी और को कैसे समझाऊ, मालूम नहीं!
जब शब्द ही नहीं है कहने को,
तो किसी को क्या बतलाऊ, मालूम नहीं!
दर्द ही दर्द है जिंदगी में मेरी,
किसी को क्या-क्या बताऊ, मालूम नहीं!
मेरे दिल के झरोखे में, कभी मैंने झाँका नहीं,
घाव फिर से कब हरे हो जाएँ, मालूम नहीं!
दवा लगाऊं कैसे, मलहम कहीं मिला नहीं,
चोट भी ऐसी है, जिसका कोई इलाज़ नहीं!
वो कहते हैं माँ सब जानती और समझती है,
मैं कैसे कहूं, मेरे पास वो भी नही.........................
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